Kahani Ka Jadu Blog विक्रम बेताल की कहानी: चुपचाप आई मौत की आवाज

विक्रम बेताल की कहानी: चुपचाप आई मौत की आवाज

चुपके से आई मृत्यु की आवाज़

एक समय की बात है, विक्रमादित्य और बेताल की यात्रा जारी थी। एक रात, वे एक जंगल में थे जहां सुनसानता छाई हुई थी। चंद्रमा की रोशनी जंगल को आलोकित कर रही थी और सिर्फ पौधों की सरिसराहट सुनाई दे रही थी। इस शांत माहौल में, एक अनूठी घटना घटी।

विक्रमादित्य और बेताल ने एक अत्यंत सुंदर मंदिर को देखा। मंदिर के द्वार पर रोशनी में एक मृत्यु भगवान की प्रतिमा थी। जब वे उसके पास गए, एक चुपके से आवाज़ सुनाई दी – “विक्रम, इस मंदिर में मेरा वास है।”

विक्रमादित्य और बेताल चकित रह गए। यह सुनने में अद्भुत लग रहा था कि मृत्यु की आवाज़ मंदिर से कैसे आ रही है। उन्होंने बेताल से पूछा, “यह कैसे संभव है? मृत्यु का वास मंदिर में?”

बेताल मुस्कान में बोला, “विक्रम, यह एक रहस्यमयी घटना है। मृत्यु व्यक्ति के जीवन का अटूट अंग होती है, और इसे जीवन के हर पहलू में महसूस किया जा सकता है। यह घटना हमें यह दिखाती है कि मृत्यु सिर्फ एक अंत नहीं है, बल्क जीवन का अटूट हिस्सा है।”

विक्रमादित्य ने गहराई से सोचा और फिर पूछा, “बेताल, तो क्या यह मतलब है कि मृत्यु एक दुःखद और आवश्यक सत्य है? क्या हमें उसे भय की वजह से दूर रहना चाहिए?”

बेताल ने आवाज़ में कहा, “नहीं, विक्रम। मृत्यु को भय के साथ नहीं देखना चाहिए, बल्क उसे समझना चाहिए। मृत्यु जीवन की अनिवार्यता है और हमें यह समझना चाहिए कि हम जब तक जीवित हैं, हमें अपने संयम, धर्म और कर्तव्य के प्रति समर्पित रहना चाहिए।”

विक्रमादित्य ने ध्यान से सुना और समझा कि मृत्यु जीवन का अनिवार्य हिस्सा है और हमें अपने कार्यों को ध्यान में रखना चाहिए। वे मंदिर से चले गए, परन्तु इस घटना का प्रभाव उनके मन में सदैव बना रहा।

यह कथा हमें यह बताती है कि मृत्यु जीवन का एक सच्चाई है और हमें उसे अपने जीवन का एक अटूट हिस्सा मानना चाहिए। हमें अपने कर्तव्यों को निभाना चाहिए, जीवन की कीमत को महसूस करना चाहिए और अनुशासन में रहकर धर्मप्रिय जीवन जीना चाहिए।

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